मंगलवार, 9 सितंबर 2014

मध्य वर्ग के सुन्दर काण्ड

        

 

आप के जीवन में कुछ ऐसे कार्यक्रमों के निमंत्रण आते ही हैं जिनमे जाने के लिए शादी से पहले आपकी माँ तथा शादी के आपकी पत्नी लम्बा भाषण पिलाती है और अंत में दोस्तों से, "अबे शुक्ला के घर की बात है, जाना पड़ेगा" की स्वीकृति के बाद आप को जाना ही पड़ता है। एक इतवार की शाम को मुझे भी ऐसे ही आयोजन में जाना पड़ा।

 

वैसे तो ये सुन्दरकाण्ड का पाठ था मगर आप इस नाम की जगह माता की चौकी, जगराता, साईं संध्या या ऐसा ही कुछ नाम रख सकते हैं और हिंदी भाषी भारत की कोई भी गली, मोहल्ला, कालोनी को स्थान मान सकते हैं।

 

अब सवाल ये कि ये आयोजन क्यों?

तो इसका सीधा सा जवाब है कि भारतीय मिडिल क्लास परिवार की श्रद्धा ऐसे आयोजनों के लिए दो कारणों से जागती है।

 

पहला जब पड़ोस के सक्सेना साहब और गुप्ता जी  ने तरक्की मिलने पर ऐसा कोई आयोजन करवा दिया हो

या फिर ग्वालियर वाली बुआ के देवर के लड़के का iit में सिलेक्शन ऐसी ही किसी मनौती के बाद हुआ हो।

 

मगर विविध भाषा वाले देश में कुछ ऐसे मूल तत्व हैं जो हर परिस्थिति में अटल रहते हैं।

 

सरकारी स्कूल में आधे से ज्यादा टाइम स्टाफ रूम में बिताने वाले हिंदी या संस्कृत के गुरूजी इतवार की शाम और अपने ज्ञान का समुचित उपयोग कर अतिरिक्त पुण्य और पैसा दोनों कमा लेते हैं।

इंडियन आइडल की लाइन में लगे रहने वाले कई घरेलू पॉप स्टार अपनी गाने की भड़ास को फ़िल्मी धुनों के भजनों से पूरा करलेते है और बीच बीच में कुछ दोहे चौपाई बड़े ही कलात्मक ढंग से गुलाम  अली स्टाइल में सुना कर आपकी धार्मिकता को भी जिलाए रखते हैं।

 

मेजबान mr शर्मा छप्पन इंच की मुस्कान के साथ स्वागत में दिख जाते हैं वहीँ mrs शर्मा अपने नए अनारकली सूट में फोटोशूट कर फेसबुक पर पोस्ट करती रहती हैं ।

 

एक कोने पर कॉलेज जाने वाली पार्टी कूल होकर नाचती झूमती दिखती है।

आप कह सकते हैं की अगर ये लोग हनी सिंह की जगह हनुमान चालीसा पर झूम रहे हैं तो इससे भारतीय संस्कृति का भला हो रहा है मगर यकीन मानिये कि जब से हर शादी में dj अनिवार्य हुआ है लोग मुन्नी और शीला क्या जनरेटर की आवाज पर भी नाच सकते हैं।

 

वैसे इस भीड़ में कुछ लोग ऐसे भी दिख जाते हैं जो किसी कोने में बैठकर अपनी बाकी बच गयी आस्था को किसी तरह जोड़तोड़ कर अपना ध्यान लगाने की कोशिश कर रहे होते हैं ओर दूसरी तरफ मेरे जैसे बीच में उठ आने वाले भी होते हैं जिनके लिए कहा जाता है कि, "पढ़ लिख कर ज्यादा मॉडर्न होगए हैं।"

 

वास्तव में संगीत और धर्म का बैर नही है।

भक्ति में जितनी साधना और तपस्या है उतना ही परम आनन्द का उत्सव भी है।

वृन्दावन और ऐसी ही कई जगहों के कुछ मंदिरों में आज भी वह भावपूर्ण कीर्तन होता मिलजाता है कि मन होता है सब कुछ भूल कर उसी में खो जाएँ।मगर जो इन तथाकथित धार्मिक आयोजनों में हो रहा है वह माध्यमवर्गीय समाज के द्वारा अपने आप को बाकियों से बेहतर साबित करने की कोशिशों पर चढ़ाया गया धर्म का मुल्लमा मात्र है।

तभी तो चीनी का खर्च महीने में 10 ₹ बढ़ जाने पर हंगामा करने वाले लोग माइक पर अपने नाम से अरदास सुनने के लिए 100₹ हँस कर देते हैं।

 

इन सबके बीच मेरी भगवान से यही प्रार्थना है की ऐसे आयोजनों से बचाते हुए वह मेरी आस्था को बचाए रखे।


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