इन कॉमिक्स में हमारी पसंद ध्रुव और नागराज होते थे और घर वालों के चाचा चौधरी।
चाचा चौधरी और साबू के साथ पढ़ते सीखते अखंड ज्योति, नंदन, बालहंस हाथ आई और देखते ही देखते कादम्बिनी समझ में आने लगी।
ग्लोबल होती दुनिया ने प्रेमचंद से इतर किसी को शेखर एक जीवनी की लत लगायी तो किसी को नरेन्द्र कोहली की रामकथा की, अलकेमिस्ट के साथ अंतर्राष्ट्रीय हुए ना जाने कितने पाठक आज फेस्बुकिये कलमकार से लेकर युवा साहित्यकार बन चुकें हैं।
आज के समय में कार्टून में शिन्चैन जब अपनी माँ को ऐ बुढ़िया कह कर बुलाता है या क्लास 11-12 के बच्चे स्कूल के पुस्तकालय से 11 मिनट्स या ट्वाईलाईट सागा की मांग करते हुए 50 शेड्स ऑफ़ ग्रे की हसरत लिए दीखते हैं तो ऐसा लगता है हमसे ठीक पहले और हमने कुछ ऐसा छोड़ा ही नही है कि हमारी अगली पीढ़ी बचपन से थोडा थोडा कर के अपनी आत्मा, अपनी जड़ों से जुड़ सके।
हालांकि प्राण और चाचा चौधरी दोनों ही रिटायरमेंट के दिन काट रहे थे मगर आज प्राण साहब के जाने के बाद अब कोई नही है जो सरल और क्रिएटिव रहते हुए भी रोचक रहे और देसी भी। जिसकी कहानियों में ना बैटमैन की तरह ना खौफ की चादर हो ना सुपरमैन की तरह रोज रोज दुनिया ख़त्म होने की झिकझक।आज के लगभग सभी युवा रचनाकारो के पढने की शुरुआत यहीं से हुई है मगर फिर भी जब शाम को टीवी पर
इन सबके ऊपर कोई कवरेज नही दिखती, कभी किसी सम्मान के लिए प्राण साहब का नाम नही सुनाई पड़ता तो अहसास होता है ये सब बातें तो पिछली सदी की थीं और हिंदी की थीं तो out of date हो चुकी हैं।
मगर इन सब के बाद भी प्राण अंकल थैंक्यू!मेरी गर्मी की छुट्टियों को कई सालों तक इंटरेस्टिंग बनाने के लिए। I will really miss you.
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