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रविवार, 3 अगस्त 2014

परसों से दो दिन पहले

बात दोस्ती के लाइफ साइकिल की,

कैसे शुरू में सीक्रेट बता कर बाद में 'कहना मत' का भरोसा लेने वाली दोस्ती 7 बजते ही अपने आप 2 कप चाय मंगवाने वाली रोज़ की मुलाकात में बदलती है और फिर फेसबुक के पन्नों से लटकती तस्वीर में बदल जाती है।

गौर फरमाइए


        

ये बात

 

परसों से दो दिन पहले की ही तो है

 

जब,

 

रोज़ के सुनसान चेहरे से हट कर

 

एक रोज़

 

डरी डरी सी मुस्कान दी थी तुमने,

 

और फिर बातों बातों में


 पता चला कि,

 

'कागज़ के फूल' तुम्हे भी पसंद हैं

 

और अमृता से 'रसीदी टिकट'

 

तुमने भी ले रखा था

 

हर इतवार,

 

नुक्कड़ की जलेबी के साथ छनकर

 

कई किस्से मीठे हुए

 

मगर पिछले मोड़ पर जब

 

रास्ते घूमे

 

तो,

 

घर तक का सफ़र

 

कुछ तनहा सा हो गया था,

 

अब जब कभी खिड़की से

 

बाहर झांक लेता हूँ

 

तो,

 

उन गलियों में कतरा कतरा,

 

हम दोनों को छूटा सा पता हूँ



1- कागज़ के फूल -> गुरुदत्त वाली

2-अमृता प्रीतम की किताब रसीदी टिकट

गुरुवार, 24 जुलाई 2014

आज फिर पहली बारिश है

खिड़की के शीशे पर
कुछ बारीक सी
बूंदों को फिसलते देखा
तो याद आया
साल गुज़र आया है
अब उस पहली बारिश को

सूखे गमले की मिटटी था मन
जब कुछ बूंदों ने
दहका दिया था अचानक

कई शब्द, शेर, जुमले, किस्से
तोड़े, जोड़े, उठा कर गढ़े
और अधूरे छोड़े,

उस नए अहसास को
बाँधने में हर रूपक
पुराना लगा था
चाँद का हर दाग भी
मीर के हर्फ़ सा
सुहाना लगा था।

फिर अचानक ही
चाय के प्याले से उंगलियों
को गर्म करते करते
वो नज़र मिलगयी
जिसने
एक मुस्कान को
एक धड़कन बना दिया।

आज फिर
वो पहली बारिश है
और बालकनी में
अखबार की लकीरों
में खोया नज़र उठाकर
ढूंढता हूँ कि
यहीं कहीं
और किसी और छत
के मुंडेर पर दो नन्हे अंकुर
खिल रहे होंगे

रविवार, 6 जुलाई 2014

आज फिर पहली बारिश है

खिड़की के शीशे पर
कुछ बारीक सी
बूंदों को फिसलते देखा
तो याद आया
साल गुज़र आया है
अब उस पहली बारिश को

सूखे गमले की मिटटी था मन
जब कुछ बूंदों ने
दहका दिया था अचानक

कई शब्द, शेर, जुमले, किस्से
तोड़े, जोड़े, उठा कर गढ़े
और अधूरे छोड़े,

उस नए अहसास को
बाँधने में हर रूपक
पुराना लगा था
चाँद का हर दाग भी
मीर के हर्फ़ सा
सुहाना लगा था।

फिर अचानक ही
चाय के प्याले से उंगलियों
को गर्म करते करते
वो नज़र मिलगयी
जिसने
एक मुस्कान को
एक धड़कन बना दिया।

आज फिर
वो पहली बारिश है
और बालकनी में
अखबार की लकीरों
में खोया नज़र उठाकर
ढूंढता हूँ कि
यहीं कहीं
और किसी और छत
के मुंडेर पर दो नन्हे अंकुर
खिल रहे होंगे

बुधवार, 2 जुलाई 2014

मुझे याद रहेगी तुमसे वो मुलाकात ऑरकुट

#-1-#

मुझे आज भी याद है
कोचिंग के आखिरी दिनों में
जब स्लैम बुक भरी जाती थीं
और मुंबई वाली दीदी से बतियाने बंटी
शहर के इकलौते कैफे में जाता था।

#-2-#

उसी ने तुम्हारा ज़िक्र किया कई बार
तो हम भी बिल्लू, राहुल और मोंटी
के साथ गए थे
तुमसे पहली मुलाकात को और
120₹ और 2 घंटे में
ऑरकुटिया के ही लौटे थे।

#-3-#

उसने क्लास में तो कभी
देखा भी न था ढंग से
पर
चैटिया के जो hiiiiii
कहा तो समोसे की पार्टी
दी थी सबको।

#-4-#

वो पतली पिन के नोकिया पर
तुम्हारा घंटों में खुलना,
फोटो स्टूडियो से cd बनवाकर
तुमपर अपलोड करना
गूगल से कॉपी कर स्क्रैप भेजना
ये सब चलता रहा और कॉलेज
के दिन गुज़रते रहे।

#-5-#

न जाने कहाँ से जेब के मोबाईल
में फेसबुक आगया।
तस्वीरें उसपर भी जाने लगीं।
फ़ोन के बटन कम होते रहे
और तुम्से फासले बढ़ते रहे


#-6-#


टैग और स्टेटस के नशे में
तुम्हारा अहसास ही
धुंधला सा गया।

आज तुम्हारे जाने की
खबर बस एक
मुक़द्दस खामोशी दे गई
है और कुछ नही

अलविदा orkut !