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गुरुवार, 25 दिसंबर 2014

नंगे आप हैं, pk नही

पीके के बारे में 3 बार ड्राफ्ट लिखकर डिलीट करने के बाद ये चौथा प्रयास है। पीके एक मसाला फ़िल्म है मगर इसमें सारे मसाले वैसे ही डाले गए हैं जैसे लखनऊ की दमपुख्त बिरयानी या मैसूर के इडली सांभर में डाले जाते हैं- कायदे से और करीने से। सस्ते होटलों की औसत डिश को स्पेशल बनाने के लिए जैसे ऊपर से 4 टुकड़ा पनीर डाला जाता है वैसे आइटम नंबर भी नही डाला गया है। राजू हिरानी जैसे अपने किरदारों मुन्ना भाई, वायरस, चतुर, सर्किट को कहावत में बदल चुके हैं वैसे ही पीके भी एक कहावत बनने की काबिलियत रखता है। जादू की झप्पी, आल इज़ वेल, गांधीगिरी की लीक पर इस बार रॉंग नंबर और लुल्ल हो जैसे नारे हैं और omg के साथ ज़बरदस्त तुलना के बाद भी फ़िल्म प्रभावित करती है। फ़िल्म के ऊपर अनगिनत रिव्यु सोशल मीडिया पर आ चुके हैं और फ़िल्म को देख कर कुछ लोग आहत मोड में जा चुके हैं। ऐसे ही आहत बंधुओं ने मुझसे भी अपील की है कि फ़िल्म हमारे धर्म पर सवाल उठाती है और इससे संस्कृति नष्ट हो रही है।

"अगर आप भगवान को देखे है तो हमारी उससे बात कराइये, नही देखे तो कैसे मान ले की वो सही भगवान है।" यही वो प्रश्न है जिससे आपका धर्म खतरे में आया मगर ये प्रश्न तो विवेकानंद ने रामकृष्ण से पूछा था। अब विवेकानंद भी पीके थे क्या?

"ये भगवान् को दूध चढ़ाये से क्या फायदा, भगवान को क्या जरूरत इस की?" इस सवाल के आधार पर तो बड़े बड़े स्टेटस लिखे गए हैं संस्कृति के खतरे की। मगर ये सवाल तो एक 8-10 साल के बच्चे ने अपने पिता से पूछा था। वही बच्चा जिसे 5,000 साल बाद लोग कृष्ण के नाम से पूजने लगे हैं।

फेसबुक के पेज, सुनी सुनाई बातों के अधूरे ज्ञान और गाय की फोटो लाइक करने से जिन लोगों को लगता है कि वो धर्म और संस्कृति को थामने के लायक हैं तो उनहे सबसे पहले नर्सरी की क्लास में बैठ कर आसमान गिरने वाली कहानी पड़नी चाहिए फिर विवेकानंद और कृष्ण की जीवनी।(दर्शन पढ़ने लायक स्तर होगा ये कल्पना करना मुश्किल है) जिस गाय की फोटो सुबह आप शेयर कर कर धार्मिक होने का दम्भ फेसबुक कोटि के हिन्दू भरते हैं उसी के लिए विवेकानंद ने कहा था कि अगर दलित अपने पूर्वजन्मों का फल भोग कर नारकीय जीवन जी रहे हैं तो भूखी गाय भी पूर्वजन्म का फलभोग रही है। गाय को रोटी देने से अच्छा है किसी भूखे को रोटी देना। और कृष्ण उन्होंने तो एक पागल बैल की हत्या ही कर दी थी। क्या हुआ? लुल्ल हो गयी? साहब धर्म इतना कमज़ोर नहीं कि एक फ़िल्म से गिर पड़े और इतना गिरा भी नही कि फेसबुक पर 267 लिखे और 89 कमेंट पाकर उठ जाए। वैसे यही बात हैदर के लिए भी कही गयी थी कि इससे "देश की शान्ती को खतरा है" एक औसत दर्जे की चुतस्पाह फ़िल्म के हिट होने से अगर हिन्दुस्तान की शांति चली जाती तो हाफ़िज़ सईद हर साल दो चार फ़िल्में ही रिलीस कर देता। वैसे एक बात और जो लोग बिना देखे या चश्मा लगाकर देख के पीके का विरोध कर रहे हैं उन्हें चाहिए कि एक बार फ़िल्म देखें कि उसमें ईसाई मिशनरी के खिलाफ भी कहा गया है , हाय हुसैन हम ना हुए के मातम पर भी सवाल उठाया गया है और सवाल उठाने पर मार डालने की बात भी उठाई गयी है।

श्रीमान, धर्म फेसबुक नही है और फेसबुक धर्म नही है। और आपको कितना भी थ्रिल्लिंग लगता हो मगर isis के लड़ाकों के साथ रहना, गाज़ा के धमाकों सुनना और सुबह स्कूल भेज कर शाम को अपने बच्चों को ताबूत में लौटते देखने वाला भारत मेरे सपनों का भारत नही है।एक फ़िल्म में एक लाइन बोल देने से खतरे में और किसी नमाज़वाले के लाल टीका लगा लेने से मज़बूत होने वाला धर्म मेरा धर्म नही है। मेरे लिए ये देश वो है जिसके बारे में मैंने बचपन से सुना है कि यहां दुनिया का हर मौसम हर त्यौहार और हर रंग मिलता है जिसकी हस्ती ना कभी मिट पायी थी ना कभी मिट पाएगी।

हिन्दुस्तान में होने का शुक्र मनाते हुए कि यहां प्रेम का सन्देश देने वाले का ना सर कलम होता है, ना सूली पर लटकाया जाता है मेरी क्रिसमस।

© अनिमेष

शुक्रवार, 28 नवंबर 2014

अगर आप फेसबुक और whatsapp दोनों प्रयोग करते है तो ज़रूर पढ़िए।

सेल्फ़ी, फेसबुक और व्हाटसएप्प ये तीन शब्द हम सभी के लिए सहज हैं और ज़्यादातर लोग इन्हें बड़ा हलके ढंग से प्रयोग करते हैं। मेरा हमेशा से मानना रहा है जैसे सोशल ऐतिकेट्स होते हैं, फ़ोन पर बात करने की कुछ तहज़ीब होती है वैसे ही सोशल मीडिया के भी कुछ तौर-तरीके हैं जिन्हें आप को बड़ी ही सावधानी से सीखना चाहिये।बात शुरू करने से पहले एक चीज़ समझ लिजिये फेसबुक एक सोशल नेटवर्किंग वेबसाइट है और WhatsApp एक मैसेंजर, दोनों का काम करने का तरीका, इस्तेमाल, फायदे और नुक्सान एक दुसरे से बिलकुल उल्टा है और हम में से ज्यादातर लोग इन दोनों के इस्तेमाल में ठीक उलटे ढंग से करते हैं, यानी जो फेसबुक पर करना चाहिए वो whatsapp पर और जो whatsapp पर करना चाहिए वो फेसबुक पर।

एक मोहतरमा जो 23-24 साल की होंगी और एक कंपनी में नौकरी करती हैं ने अपनी फेसबुक प्रोफाइल को बहुत निजी रखा है यहाँ तक की अपनी फोटो भी नही लगायी है(पहली गलती)।वो whatsapp भी इस्तेमाल करती हैं और अक्सर अपनी whatsapp, viber पर फ़ोटो सेल्फ़ी के रूप मे खींचकर लगाती रहती हैं(दूसरी गलती)। उनके किसी दीवाने ने मैडम का नंबर अपने मोबाइल में सेव कर लिया अब उस एकतरफा आशिक़ ने (जो शायद लड़की के आसपास से ही है) वो सारी फ़ोटो लंबे समय तक अपने फोन में सेव कीं। मैडम ने अपने फ़ोन में कोई कोड नही डाला था(एक और गलती) और सेल्फ़ी के शौक में अपने घर की, सो के उठकर, कम(नाममात्र के)कपड़ों में तस्वीरें ले रखीं थीं(सबसे बड़ी गलती)
किसी तरह से वो तस्वीरें उस बन्दे ने अपने फ़ोन में ट्रान्सफर की(याद रखें उत्पीड़न के 50फीसदी मामले अपनों के द्वारा ही होते हैं) और फेसबुक पर उसी लड़की के नाम और तस्वीर से एक प्रोफाइल बनाकर अपलोड कीं। इसके बाद एक एक कर के वो तस्वीरें भी आना शुरू हुई जिनका सामने आना कोई अपराध तो नही पर शर्मनाक ज़रूर था। इसके बाद उसी व्यक्ति ने खुद अपने आसपास उस लड़की के बारे में बाते फैलाना शुरू किया।
आज उस व्यक्ति की पहचान और शिकायत भी कर दी गयी है शायद उसपर कार्यवाही भी हो पर जो नुकसान हो चुका उसकी भरपाई मुशकिल है इस घटना से आप को कुछ सबक ज़रूर सीखने चाहिए।

फेसबुक कोई चैटिंग पोर्टल नही है और यहां आज वास्तविक प्रोफाइल की संख्या फेक प्रोफाइल से ज़्यादा है अतः या तो आप इस पर अकाउंट बनाइये मत और अगर बनाइये तो कम एक वास्तविक फ़ोटो डालिए। वरना कल को आप के नाम से कोई फेक प्रोफाइल बनाएगा तो आप के शुभचिंतक आपके बिना तस्वीर वाले असली अकाउंट को ही नही पहचान पाएंगे।

whatsapp का इस्तेमाल भारत में 7करोड़ लोग करते हैं और इनमें किसी को आप की तस्वीर तक पहुँचने के लिए सिर्फ आप का फ़ोन नंबर चाहिए होता है तो यहाँ अपनी तस्वीर बार बार न बदला करें।(उसपर लाइक भी नही मिलते)

फेसबुक पर अपने बच्चों की तस्वीर और उनके स्कूल के प्रोग्राम की डिटेल कभी ना डालें आप के बच्चे निश्चित ही प्यारे हैं पर लाइक और कमेंट पाने की चीज़ नही हैं।(ह्यूमन ट्रैफिकिंग, किडनैपिंग की ज़्यादातर घटनाओं में जानकारी अब यहीं से उपलब्ध होती है)

आप कहीं घूमने जा रहे हैं, हवाईजहाज, ट्रेन में अकेले सफ़र कर रहे हैं तो इसको स्टेटस में अपडेट ना करें वापस आकर फ़ोटो शेयर करें(आप के घर को अकेला जानकार कौन हाथ साफ कर जाए,कौन आपकी अकेली पत्नी, बच्ची पर........)


अपने फ़ोन में पैटर्न लॉक ज़रूर डालें (आपके फोन में आप के ही नही दूसरों की पर्सनल चीज़ें जैसे उनके नंबर आदि भी होते हैं साथ ही साथ आप की हर id बैंक अकाउंट की डिटेल वगरह भी सेव रहती है यदि आप इंटरनेट से खरीददारी करते हैं तो ये स्थिति और खतरनाक होजाती है)।

आखिरी और सबसे ज़रूरी बात जिसे शायद आपने भी किया या देखा हो कई लोग अपनी पत्नी, प्रेमिका के साथ कुछ व्यक्तिगत तस्वीरें खींचते हैं, लड़कियाँ अपने व्यक्तिगत आनंद के लिये टॉवेल शॉर्ट्स वगैरह में सेल्फ़ी खींचती हैं अगर ऐसी तस्वीर सामने आना आप के लिए असहज है तो तस्वीर मत खींचिए क्योंकि मेमोरी कार्ड से डिलीट होने के बाद भी डेटा रिकवर किया जा सकता है और तस्वीर सबसे आसानी से रिकवर होने वाली वस्तु है।(इसे करने के लिए किसी बड़े तामझाम की आवश्यकता भी नही पड़ती और कितनी भी पुरानी मेमोरी हो तस्वीर 100 में 90 बार वापस आ जाती है) और साइबर क्राइम की सब बातों के बाद भी आप उस तस्वीर को फेक साबित नही कर पाएंगे।

सोशलमीडिया और इंटरनेट बहुत कमाल की चीज़ है। इसे कायदे के साथ इस्तेमाल करिये, बहुत फायदा मिलेगा। अपनी लापरवाही से अपने आपको इस खूबसूरत चीज़ से महरूम मत करिये।

अगर सही जानकारी लगी हो तो इस लेख को आगे शेयर कर दें।


©अनिमेष
तस्वीर इंटरनेट से साभार

सोमवार, 3 नवंबर 2014

किस Kiss की कहानी

पिछले कई दिनों से समझ नही आरहा था कि यहाँ किस की बात करूँ, आज अचानक से जब ट्विटराते जीवों को किस ऑफ़ लव की बातें करते देखा तो लगा, "क्यों न Kiss की बात करी जाए।"
हिन्दी का किस नही अंग्रेज़ी का वही किस जिसके टीवी पर आते ही आप को उठकर पानी पीने जाना पड़ता है और पापा रिमोट से चैनल बदलने की प्रक्रिया को बिना किसी चूक के दोहराते हैं। कोच्ची में जिस किस ऑफ़ लव नामक आयोजन ने अंग्रेजी (अब राजश्री के आलावा सभी हिंदी) फिल्मों की इस अनिवार्य परंपरा को फिर से चर्चा प्रदान की उसकी बात करने से पहले कुछ तथ्य बता दूं किस के बारे में, जिन्हें आप अपने दोस्तों के बीच अगली बार चटखारे ले कर सुना सकेंगे।(सभी तथ्य इन्टरनेट के विभिन्न स्त्रोतों से प्राप्त)

Kiss और honeymoon दोनों की शुरुआत भारत से हुई।किस का पहला ज़िक्र ऋग्वेद में मिलता है जहाँ इसे बोस कहा गया और वहां से ये शब्द लैटिन में बुस बना फिर कुस में परिवर्तित होते होते अंत में किस पर आकर रुका।

लिप-लॉक प्रजाति का किस जिसे अब तक आप अब तक हॉलीवुड से सीखा गया मानते हैं वो भी सिकंदर ने पहली बार हिन्दुस्तान आकर देखा (शायद कर के भी) और सीखा।

हिंदी फिल्मों में चुम्बन युग की शुरुआत मल्लिका शेरावत से कहीं पहले 1929 में (साइलेंट फिल्मों) हो चुकी थी। और 1933 का देविका रानी हिमांशु रानी के बीच 4मिनट का द्रश्य आज भी हिन्दी सिनेमा के सबसे लम्बे दृश्यों में से एक है।

खैर अब इन बातों से बाहर आकर बात करते हैं उस मुद्दे की जिस के बारे में कई दिनों से चर्चा चल रही है।कोच्ची में एक समूह के द्वारा मोरल पुलिसिंग के खिलाफ एक साथ एक जगह पर किस करने की घोषणा की गयी थी और जैसा स्वाभाविक था इसपर विवाद भी हुआ।

मेरी व्यक्तिगत पसंद ऐसे किसी आयोजन की नही है क्योंकि मुझे लगता है कि ये समूह भी निर्णय लेने की स्वतंत्रता से ज्यादा दिखावे की आज़ादी की तरफ ले जाते हैं। ऐसे सभी आयोजनों के बाद मेरे जैसे कई(मुझे नही) अकेले बन्दों को ऐसा लगता है कि ब्लैक एंड डॉग्स नॉट अलाउड की तख्ती आज भी उनके लिए लगी हुई है। मगर मुझे इस आयोजन के विरोध से आपत्ति है।

वैलेंटाइन दे या किस ऑफ़ लव के बाद दो तर्क खूब दिए जाते हैं कि इससे हमारी संस्कृति खतरे में है। आज जींस पहन कर घूम रही हैं कल बिना कपड़ों के घूमेंगी। आज गाल पर किस किया है कल सबकुछ सामने होगा।

अगर 5000 साल पुरानी परंपरा को आप ने इतना कमज़ोर बना दिया कि अगली पीढी के एक आध गुलाब लेने-देने से वो ख़त्म हो जायेगी तो ऐसी दशा के ज़िम्मेदार तो आप ही हो ताऊ। आप खुद सोचिये देश में ऐसे आयोजनों तक आने की नौबत क्यों आयी। पिछले कई सालों में हर वैलेंटाइन दे पर श्रीराम सेना जैसे संगठनों ने खूब तोड़-फोड़ की, सामान्य रूप से घूमते जोड़ों को सरे आम बेईज्ज़त किया, लड़कियों को पीटा, क्या ये भारतीय संस्कृति का हिस्सा था? पिछली साल दिल्ली स्टेशन पर गले मिल रहे पति-पत्नी को पुलिस ने गिरफ्तार किया और फिर अदालत ने उन्हें निरपराध घोषित किया। अगर स्त्री पुरुष के सामाजिक संबंधों को इन संगठनों ने सामान्य रखा होता तो शायद आज ऐसे आयोजनों की नौबत नहीं आती।

अश्लीलता किसी भी रूप में गलत है मगर हमारे समाज के ठेकेदार एक खास प्रकार की सोच को ही पूरे भारत की सोच बना देते हैं। जबकि भारत की विविधता इतनी है कि उसे कभी आयामों में नाप ही नही जा सकता। उत्तर भारत में नवरात्र का अर्थ है व्रत उपवास वहीं बंगाल में यह समय फ़ूड फेस्टिवल का है और जितनी अधिक तरह से पकी मछली आप को नवरात्र में मिलेगी वो किसी और समय मिलना दुर्लभ है। ठीक ऐसे ही उत्तर भारत में अधिकतर महिलाओं के द्वारा रखा जाने वाला एकादशी का व्रत कई जगहों पर सिर्फ विधवाओं का व्रत है। फिर आप कैसे कह सकते हैं कि आप के खानदान में स्त्रीयाँ घर से बाहर नही निकलती हैं तो वो कुलीन हैं और उत्तर पूर्व राज्यों (जहाँ स्त्री सत्ता प्रचलित है) की महिलायें जो ज्यादा बाहिर्मुखी होती हैं चरित्रहीन है।

ठीक इसी प्रकार से कई समूहों में किस का अर्थ व्यक्ति के साथ बदलता है।एक बड़ी महिला का किसी दूसरी स्त्री को चूमना आशीर्वाद है तो समान उम्र की दो महिलाओं का हवाई चुम्बन सिर्फ एक नमस्कार, यूरोप में अगर कोई बड़ी लडकी किसी छोटे लड़के को चूमती है तो वो भाई बहन का प्यार है।

खैर इन सब को छोड़िये एक कविता की दो पंक्तियाँ जो ऐसे ही किसी किस ऑफ़ लव से खिसियाये शायर ने कहीं होंगी।

किस किस की महफ़िल में
किस किस नेकिस किस को
किस किस तरह से किस किया।
एक वो हैं,
जो हर मिस को किस करते हैं
एक हम हैं,
जो हर किस को मिस करते हैं।

अभी भी कुछ बचा हो किस के बारे में तो इस लिंक पर पढ़ सकते हैं।
http://m.wsj.com/articles/BL-IRTB-27097

©अनिमेष

बुधवार, 22 अक्टूबर 2014

मुझे चेतन भगत पसंद हैं पर मै उन्हें पढता नही हूँ

इस दिवाली पर हिंदी साहित्य की बात से बात शुरू करता हूँ। अब ये मत सोचियेगा कि हिंदी की बात हिंदी दिवस पर ही की जा सकती।

हिंदी साहित्य बिकता नही, हिंदी में ऐसा साहित्य लिखा नही जा रहा जिसे पढ़ा जाए। हिंदी टिपिकल है, ये सारी बातें कही जाती हैं और इन्हें ख़ारिज भी नही किया जा सकता। अब कुछ तथ्य देखिये।
चेतन भगत के अलावा अंग्रेजी के सारे फिक्शन राइटर मिला लीजिये-

रविंदर सिंह, दुर्जोय दत्ता, अरविन्द अडिगा सब को मिला कर उनके फेसबुक पेज के लाइक जोड़ लीजिये और 10 से गुणा कर दीजिये फिर भी कुमार विश्वास के लाइक्स से आधे ही रहेंगे।
चेतन भगत को फेसबुक पर 58लाख लोगों ने लिखे कर रखा है और कुमार को 23 लाख, जबकि चेतन की कई किताबों के सामने कुमार के गिने चुने मुक्तक हैं।

हिंदी के ठीक-ठाक कवियों का एक पेमेंट चेक किसी mba फ्रेशर के महीने भर के वेतन से टक्कर लेता है।

दैनिक जागरण एक दिन में 16 लाख कॉपी बेचता है।

इन सब तथ्यों के साथ आप को ये शक नही होना चाहिए कि हिंदी का पाठक पैसे खर्च नही करता या हिंदी में लोग पढ़ते नही हैं।फिर ऐसा क्या है कि हिंदी की किसी किताब (अनुवाद नही) की 500 कॉपी बिकना खबर बन जाती है।इसे समझने के लिए अपने बचपन में वापस जाइये।

स्कूल के दिनों में कोर्स की किताबों में प्रेमचंद की ईदगाह से शुरू कर के हाईस्कूल में वसीयत जैसी कहानी ने हमारी आज के पीढ़ी को चम्पक, सरिता, कदिम्बिनी से लेकर शेखर एक जीवनी तक का पाठक बनाया। ऐसे में हम जब बस अड्डों पर मिलने वाली मोटी स्लेटी पन्नों की किताबों को देखा करते थे तो घर वालों की हिदायत,
"गंदी किताबे हैं।अच्छे घरों के बच्चे नही पढ़ते"
हमें इन किताबों के लिए एक अलग तरह की गाँठ हमारे मन में डालती गयी।

कुछ समय बीता और फिर mba कर के आये एक शख्स ने अपनी कामचलाऊ अंग्रेजी में एक किताब लिखी "5 point someone- what not to do in IIT"
इस टाइटल में जो iit वाली बात लिखी हुई थी उसने मुझे और मेरे साथ के हर युवा के दिल में छुपे सपने को खरोंचा और किताब की लाखों कॉपी बिक गईं।इस किताब ने एक बात और सिखाई कि बिना डरे अंग्रेजी का पूरा उपन्यास भी पढ़ा जा सकता है और उसमें मज़ा भी आता है

अब अतीत से बाहर आइये।
आज की आम धारणा है हिंदी के मठाधीश साहित्यकार और प्रकाशक मिलकर घिसीपिटी किताबें ऊंचे दाम पर छापते हैं और सरकारी लाइब्रेरी के अलावा उन्हें कहीं पाया नही जाता।
छपनेवाली कवितायेँ ऐसी होती हैं जिन्हें समझने के लिए कोई अलग तरह की गोली खानी पड़ती है।
ये बातें सही हैं मगर पूरी तरह नही। कुछ लोग हैं जो इस बात को बदलने में लगें हैं। इनका धंधा साहित्य की दूकान चलाना नही है बल्कि ये उसी mba,बी टेक वाली पढाई से आये हैं जिसके साथ ढंग का पैकेज मिल ही जाता है और इन्हें ढंग की अंग्रेज़ी भी आती है।किन्तु जैसे समोसे को अंग्रेजी में पैटीज़ कहने से स्वाद चला जाता है वैसे ही जो पैनापन हिंदी में बात कहने से आता है वो अंग्रेजी में नही आता।

ललित कुमार के पोर्टल Kavitakosh.org पर जाइये हिंदी-उर्दू, के लगभग हर कवि(पुराने से नए सब) की कविता आपको मुफ्त में मिलेंगी इस पूरे सर्वर को चलाने से लेकर लाखों कविताओं को अपलोड करने तक पूरी प्रक्रिया इनके तथा इनकी छोटी सी टीम के प्रयास हैं और  इसके बदले में इन्हें शुभकामनाओं और टेंशन के आलावा कुछ भी नही मिलता।

दूसरी तरफ शैलेश भारतवासी अपने हिन्दयुग्म प्रकाशन से अकेले ही कई नए लेखकों को बेस्ट सेलर बना चुके हैं। इनके प्रकाशन में iim के हाई पैकेज वाली टीम नही है और ना ही चेतन भगत की तरह सलमान खान इनकी किताब की तारीफ करते हैं।

ऐसे और कई लेखक और संस्थाएं हैं जिन का दिमागी फितूर उन्हें इन कामों में लगाये रहता है।
तो अगर आप को लगता है कि आप को पढने का शौक है तो इस दिवाली एक नयी किताब ऑनलाइन आर्डर कीजिये। हिंदी के सिस्टम की वजह से ये अभी ऑनलाइन ही उपलब्ध हैं। आपके शहर के रेलवे स्टेशन तक आते आते इन्हें समय लगेगा। 100₹ की किताब अगर पसंद ना आये तो मेरे जैसे किसी को गिफ्ट कर दें।

यहाँ पर किताब या लेखक का नाम बस इसलिए नही दिया कि कुछ नाम लिखने में कई छूट सकते हैं।

मैंने अपनी किताब आर्डर कर दी है और 3-4 दिन बाद 100₹ कैश ऑन डिलीवरी देकर एक नया नियम शुरू कर रहा हूँ,दिवाली पर ज्ञान का दिया जलाने का। आप भी करिए और लोगों को भी करवाइए।अगर कोई भी मदद चाहिए तो मै हाज़िर हूँ।

इस पोस्ट को शेयर करने का अनुरोध सिर्फ इसलिए है कि अगर आप एक विचार से सहमत हैं तो वो दूसरों तक पहुंचे वरना हिन्दी ब्लॉग के गूगल पैसे नही देता।

ज्ञान के दीपक जलाने की आशा के साथ शुभ दीपावली।

गुरुवार, 16 अक्टूबर 2014

महिषासुर शहादत दिवस- दलितों के साथ भद्दा मजाक दलित विमर्श के नाम पर

महिषासुर शहादत दिवस की बात करने से पहले आज आप को इतिहास की एक घटना सुनाता हूँ।वैसे तो यह बात ncert की इतिहास की किताबों में भी दर्ज है मगर मेरे एक दोस्त ने मुझसे इसका ज़िक्र यहाँ करने के लिए कहा है।

आज़ादी से काफी पहले की बात है। मैसूर के पास एक रियासत थी त्रावनकोर स्टेट, यहाँ दो जातियां रहती थीं, नायर और नादार। एक अपने क्षेत्र की सर्वोच्च ब्राम्हण और दूसरी दलित।दलित और ब्राह्मण में कोई तो फरक होना चाहिए था सो पंडितों ने कहा या कहें कि एक रिवाज़ बनाया कि दलितों में कोई भी, स्त्री-पुरुष दोनोंकमर से ऊपर कोई कपड़ा आदि नही पहनेंगे।
जी हाँ पूरे गाँव की हर दलित महिला ऐसे ही मालिक लोगों की सेवाएं करती थी। इन सेवाओं में ऐसी बहुत सी सेवाएं थीं जिनकी आप इस समय कल्पना कर रहे होंगे।
ऐसे मे कुछ मिशनरी लोगों ने नयी पीढ़ी के लोगों को समझाया कि वो दलित से इसाई बन जाएँ तो पंडित जी के नियमों को मानने की ज़रुरत ख़त्म।
लोग मान गए और महिलाओं ने ब्लाउज पहनना शुरू किया। सवर्णों को क्या लगा उसे बताने की यहाँ ज़रुरत नही मगर उन्होंने दलितों की पूरी बस्ती जला दी, उन्हें मारा-पीटा और और भी जो कुछ वो वहाँ कर सकते थे किया।मामला अदालत में गया और न्यायाधीश(रियासत के) ने कहा कि सवर्ण स्त्रियों के सामान अपने शरीर के उपरी हिस्से को ढक कर इन्होने बहुत बड़ा पाप किया है और इसका दंड इन्हें मिलना ही चाहिए था।

ऐसी बहुत सी घटनाएं हैं जिन्हें पढ़कर मुझे इस जातीय अस्मिता से घृणा हो गयी है।शायद आप कहें कि आज ऐसा नही होता है। ये तो पिछली सदी की बाते हैं। आज सब बराबर है।
तो कभी शहर उस हिस्से में जाइये जहाँ पिछड़ी या दलित कही जाने वाली जातियां रहतीं हैं। मै गया हूँ, यकीन मानिए जो सोच भी नही सकते हैं हम आप उन सुविधाओं के बिना वो रहते हैं। ये भी ना हो तो ओमप्रकाश वाल्मीकि की जूठन या तुलसीराम की मुर्दाहिया पढ़ कर देखिएगा, सच मानिए हिल जायेंगे।

वैसे एक बात और बताऊं, मेरे एक और ठाकुर मित्र के ही एक रिश्तेदार काफी गर्व से मुझे बता चुके हैं कि, उनके गाँव में दलितों की कोई ऐसी लड़की नही रही जो 'ठाकुरों, से होकर ना गयी हो.' और जब एक बार इनलोगों(दलितों) ने अपने दूल्हे की बारात कार में निकाली तो गाँव के ज़िम्मेदार लोगों ने पूरी बारात को पीटा, दूल्हे को मुर्गा बनाया साथ में पूरे खाने में मिट्टी मिला दी।

खैर!

मेरा आज की इस पोस्ट का उद्देश्य ये नही था और मै इस पोस्ट के हेडिंग को बिलकुल भूला नही हूँ। मेरी समस्या यह है कि गीता की 'धर्म वही है जो लोक कल्याण करे' वाली सीख को मैंने कुछ ज्यादा ही सीरियसली ले लिया इस लिए मै ना दक्षिणपंथी बन सका न वामपंथी।

दक्षिणपंथ के मेरे मित्रों के पास आज कल गायों को पूजने और पकिस्तान के हिन्दुओं की चिंता करने से ही समय नही है कि वो नारकीय जीवन जी रहे भारतीय लोगों के बारे में सोचें।सड़क के आदमी की बात करने का ठेका अब वामपंथियों ने ले रखा है।इन्डिया गेट पर सरफरोशी की तमन्ना, ओ री चिरय्या गाकर और फेसबुक पर पेज बनाकर इन प्रगतिशीलों ने गरीबों और दलितों की खूब मदद की।ऐसे ही एक मदद की घटना में एक उत्सव शुरू करने की कोशिश की गयी महिषासुर शहादत दिवस, इस उत्सव के पीछे की कथा संक्षेप में कुछ यूँ है,

'''महिषासुर भैंस चरानेवालों का सरदार था। देवताओं को यह बात पसंद नही आई और उन्होंने दुर्गा
(आप देवी दुर्गा कह सकते हैं) को भेजा दुर्गा ने महिषासुर के साथ 8 दिन उसके शयनकक्ष(bed room) में उसके साथ बिताये 
और नवें दिन शराब पीने के बाद खंजर से उसका सीना चीर दिया।''

इस कथा के पीछे कोई रिसर्च नही की गयी, ना कोई तर्क या प्रमाण दिया गया। यहाँतक कि जो संथाली लोककथा इस का आधार बताई गयी उसके जानकारों ने उस कथा में ऐसी कोई बात होने से इनकार कर दिया।

मै एक बार को इस पूरी कल्पना को सच मानने को तैयार हूँ बिना किसी तर्क के, पर मेरा सवाल है कि इससे मेरे शहर में सर पर मैला ढोनेवाली उस औरत के जीवन में क्या फर्क आएगा?
उन बच्चों को क्या मिलेगा उससे, जो स्कूल ना जाकर कूड़े के ढेर से कचरा उठाते हैं?
क्या ढाबे पर झूठी प्लेट धोता छोटू अगर 'महिषासुर की जय' बोल देगा तो मालिक उसकी तनखाह बढ़ा देगा?
या आप के ये साबित कर देने से की दुर्गा ने 8 दिन महिषासुर के बिस्तर पर गुज़ारे थे, gb रोड जैसे इलाकों में लाई गई औरतें अपनी जिंदगी जी पाएंगी?
जवाब आप भी जानते हैं और मै भी!

दरअसल चाहे गले में लाल मफलर डालकर सिगरेट फूंकने वाले कामरेड हों या हर बात में अपनी संस्कृति और भावना के आहत हो जाने वाले भक्तजन या फिर वो लोग भी जिन्हें हर बात में सियासी साजिश, अमरीका के नापाक इरादे या ऐसा ही कुछ दिखता रहता हैं ये सब धूमिल की कविता के वही तीसरे आदमी हैं जो ना रोटी पकाते हैं न खाते हैं पर रोटी के साथ खेलते हैं और सबसे ज्यादा कमाते हैं।

वैसे जाते जाते बता दूँ कि फॉरवर्ड प्रेस ने इस महिषासुर उत्सव पर जो पत्रिका निकाली थी उसकी सभी कॉपी पुलिस ने जब्त कर लीं और मामला कोर्ट में है। मेरे पास वो चित्र हैं जो इस पत्रिका में छापे गए हैं पर मै उन्हें यहाँ नही दे सकता। फॉरवर्ड प्रेस के बेचारे लोगों का कहना है कि ये उनकी धार्मिक तथा अभिव्यक्ति की स्वंत्रता पर हमला है और भले ही वापस त्रावन्कोर की तरह एक और संघर्ष हो जाए पर महिषासुर की पूजा तो होनी ही चाहिए।

आप भी सोचिये कि पिछली सदी से आज तक हम एक समाज के रूप में कितना परिपक्व हुए हैं।
मंगल तक राकेट सुनने में अच्छा लगता है मगर इससे मंगल कितना होगा पता नही।



अगर पोस्ट को शेयर या कमेंट
कर सकें तो मुझे अच्छा लगेगा, क्योंकि लिखते रहने के दीपक में फीडबैक का तेल पड़ते रहना चाहिए**

©अनिमेष

शनिवार, 11 अक्टूबर 2014

मुझे खिसियाहट होती है इन त्योहारों से

इस पोस्ट को पढ़कर यदि आपकी भावनाएं आहत होती हैं तो मै पहले ही आपसे माफी मांग लेता हूँ और सभी पढ़नेवालों से मेरा अनुरोध है कि इस पोस्ट के नीचे अपने कमेंट अवश्य दें।
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मुझे करवाचौथ से खिसियाहट आती है।
जी हाँ!
मेरा स्पष्ट मत है और अगर आप ये कहें कि मै भारतीय संस्कृति का सम्मान नही करता तो मै बता दूँ की इतनी ही खिसियाहट मुझे वैलेंटाइन डे पर भी होती है।

वैसे मूल रूप से तो ये त्यौहार पश्चिमी उत्तरप्रदेश और पंजाब के वैश्य और ब्राम्हणों का त्यौहार था मगर यशचोपड़ा की फिल्मों ने nri मेनिया के फैलाव के साथ इसे पूरे हिन्दोस्तान में फैलाया।आज के दौर में मैंने भारत और इंडिया दोनों जगह इसे अलग-अलग ढंग से मनाये जाते देखा गया है।बात को आगे बढाने से पहले दो घटनाएं सुनिए दोनों मेरे पड़ोस की हैं और वास्तविक है।

एक सरकारी नौकरी में 40,000 महीने कमाने वाली महिला हैं जिनके पति मुश्किल से 10,000 कमाते हैं। मैडम ऑफिस के बाद सीधे मंदिर जाती हैं, हर पूरनमासी को वृन्दावन जाती हैं और घर की सारी ज़िम्मेदारी पति की होती है और अगर कोई गलती हो जाये तो चप्पल से सर जी की पिटाई जायज़ है क्योंकि भगवान की भक्ति में बाधा डालने वाले को दंड तो मिलना चाहिए।

दूसरी तरफ एक भाई साहब हैं जो ठीक ठाक कमाते हैं और पत्नी भी कमाती है। बीवी की सारी कमाई पुत्र लेकर माँ को दे आता है और फिर बीवी अपनी ही तनख्वाह पूरे हिसाब के साथ लोन की तरह मांगती फिरती है। वो पड़ोस में भी जा नही सकती। उसे मैगी पसंद है पर महिने भर की मेहनत और 10,000 रुपए के बाद भी वो एक पैकेट मैगी नही खा सकती क्योंकि सासू माँ को बाज़ार का खाना अच्छा नही लगता।मगर दोनों परिवारों में करवाचौथ अनिवार्य है।

अपने जीवनसाथी की लम्बी उम्र मांगने में कोई बुराई नही है मगर टीवी चैनल की कवरेज और शाहरुख़ खान की फिल्मों से आज यह लगने लगा है कि अगर आपने करवाचौथ पर पत्नी के साथ बोले चूड़ियाँ नही गाया तो आप में कोई कमी है। मेरे घर में इस त्यौहार के लिए कोई स्थान नही है पर नयी पीढ़ी की मेरी भाभियाँ मेरी माँ पर तंज़ कसती दिख जाती हैं कि आप क्या चाचा से प्यार नही करतीं? आप को रखना ही चाहिए।

मेरा सवाल ये है कि ये कौन सी ठेकेदारी है जो ये सर्टिफिकेट दिए जाते हैं आप ऐसा नही करते तो आपने प्रेम नही किया। इसके आलावा बाज़ार के इशारों पर नाचते मीडिया ने जैसे वैलेंटाइन डे पर अकेले फिल्म देखने जाने को अघोषित गुनाह बना दिया है वैसे ही करवाचौथ पर लगता है कि अगर आपने अपनी पत्नी को बच्चन साहब की तरह हीरे के कंगन नही दिए तो जा कर डूब मारिये चुल्लू भर पानी में और विज्ञापन वाली बहनजी सिर्फ 3.5लाख तो ऐसे कहती हैं जैसे सब्जी वाले से 2 गड्डी धनिया मुफ्त में लेने को कह रहीं हों।

3सरी सबसे बड़ी दिक्कत मेरे उन भाइयों से मुझे है जो खुद व्रत रखने लगें हैं। इस दिक्कत का कारण मेरा 'मेल ईगो' नही है। अरे भाई बीवी को भूखा नही देख सकते तो उसे कहो कि व्रत ना रखे या फिर कहो कि जैसे नवरात्रि के या किसी और व्रत में आप सिंघाड़े के आटे की पूड़ी खाने की जुगाड़ कर सकते हैं वैसे वो भी कर ले। मगर आप नही करेंगे क्योंकि आप पति हैं भगवान नही और आप अपनी लम्बी लाइफ के कुछ कीमती साल कम होने का रिस्क कैसे ले सकते हैं। यहाँ पर मुझे 'दिव्य प्रकाश दुबे' की कहानी 'विद्या कसम' याद आ रही जिसमे लड़का कहता है कि सबसे सेफ भगवान की कसम है क्योंकि भगवान् मरते नही हैं।

खैर इस सामूहिक मैरिज अनिवेर्सेरी की शुभकामनाएं लीजिये।मेरे लिए ये राहत की बात है की मुझे जीते जी अपनी पूजा करवाने की ज़िम्मेदारी नही मिली है तो मै थोड़ा-बहुत पापी बना रह सकता हूँ। जाने से पहले जो भी हो कमेंट ज़रूर डालें, सहमत और असहमत दोनों में से जो लगे उसका, आपको आपकी वाली या वाले की कसम।

©अनिमेष

गुरुवार, 2 अक्टूबर 2014

मोदी, गाँधी, गाँधी-शास्त्री जयंती और गाँधीवाद

दशहरे की पूर्व संध्या के साथ-साथ आज गाँधी और शास्त्री जयंती है और हमारे प्रधान-सेवक नरेन्द्र मोदी जी सड़कों पर झाड़ू लगा रहे हैं। मुझे पता नही या यूँ कहूँ मै पता नही करना चाहता हूँ कि इस काम से लोग कितना सफाई पसंद बनेंगे।मगर एक दूसरा पहलू भी है जिसने मुझे आज बड़ा विचलित किया।

गांधी जयंती पर गाँधी का अनुयायी होने का दंभ भरने वाले लोग इस सफाई अभियान का उपहास कर रहे हैं।वो गाँधी को क्या समझते हैं पता नही पर मुझे इतना पता है कि गाँधी ने कहा था "पाप से घृणा करो पापी से नही।"
हो सकता है ये एक प्रचार का हथकंडा हो मगर इस से प्रेरित हो कर हम अपने अपने परिवेश को तो सुधार सकते हैं।

दूसरी समस्या मुझे अपने कई पूर्व सहपाठियों से लगी जो शायद अपने दिमागी स्तर के निचले पायदान पर ठहरे हुए हैं।सुबह से पोस्ट को अनटैग करने में काफी समय बर्बाद किया जिनका सार यह था कि गाँधी से गया बीता कोई नही इस देश में।
मै गाँधीवादी नही हूँ, मगर 100 में से 80 बार वही सही साबित होते हैं।
जब दिल्ली की एक सर्द सुबह इन्साफ मांगते लोगों पर पुलिस हड्डियों को कंपा देने वाला पानी डालती है और लोग अगले दिन वापस आकर खड़े हो जाते हैं और शांति से कहते हैं कि बिना इन्साफ के वो नही हटेंगे, तो बापू की तस्वीर मानो कहती है की एक गाल के बाद दूसरा गाल सामने कर दो।

जब अबूझमाल जैसे किसी गाँव से कुछ निर्दोषों के मारे जाने की खबर आती है तो फिर अहिंसा याद आती है।
जब लोग चीन से जीतने के लिए उसकी वस्तुओं का बहिष्कार करने की बात करते हैं तो मुझे भी लगे रहो के मुन्ना की तरह बापू की गांधीगिरी समझ आती है।

ऐसा नही है कि मोहन दास करमचंद गांधी भगवान थे जो कभी गलत नही हुए या उनकी हर बात को बिना परखे ही माना जाना चाहिए मगर वो उस बेईज्ज़ती के भी पात्र नही जो उन्हें हर कदम पर मिलती है। आज के तमाम नेताओं की तमाम कमियों के बाद भी लोग उनके चरणों में लोटते हैं मगर सबसे ज्यादा गाली एक ही नेता को देते हैं, गाँधी से ज्यादा अश्लील चुटकुले शायद ही किसी और नेता पर बने हों।

आप गोडसे को संत का दर्ज दीजिये या नही मुझे फर्क नही पड़ता मगर जिस आदमी ने देश के लिए काफी कुछ किया या करने की कोशिश की उसे इज्ज़त तो दीजिये।

दूसरी बात आज की एक पोस्ट के लिए जिसमे शास्त्री जी को हिंदुत्व और जातीय अस्मिता के नाम पर याद किया गया था। जिस आदमी ने कभी अपने सरनेम का प्रयोग नही किया सिर्फ इस वजह से कि उसकी जातीय पहचान का बोध ना हो उसे ही याद करने के बहाने जातीय समीकरण तलाशे जा रहे हैं।

इस उम्मीद के साथ कि भक्तगण आज के दिन नवरात्र को होने वाली प्लास्टिक की प्लेट्स वाली गंदगी को कम करने का प्रयास करेंगे और मोदी की सफाई की शुरुआत को नाटक कहने वाले लोग खुद नालों में उतर कर सफाई करेंगे।

शुभ विजया!

बोलो दुर्गा माई की जय
आस्चे बोछोर आबार होबे
(अगली साल फिर से उत्सव होगा)


रविवार, 28 सितंबर 2014

साहित्य और संगीत का गला हम उसके प्रेम के नाम पर दबा रहे हैं

संस्कृत की एक कहानी हम सभी ने बचपन में पढ़ी है, जिसमें एक राजा एक बन्दर को सेवक बनाकर रखता है। यह सेवक एक दिन अपनी ज़रुरत से ज्यादा सेवा के चाकर में राजा की ही नाक काट देता है। यह कहानी आज एक कार्यक्रम से लौटने के बाद रह रह कर याद आ रही है।

फर्रुखाबाद हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत का घराना है और ठुमरी के बड़े विशेषज्ञ स्व० ललन पिया की भूमि भी रही है।

आज ललन पिया जन्मतिथि है और शास्त्रीय संगीत का एक कार्यक्रम शहर के एक प्रतिष्ठित कॉलेज में था। आज की तारीख में शास्त्रीय संगीत के कार्यक्रम में लोग कितनी रूचि लेते हैं इस पर तो किसी को गलतफहमी नहीं होनी चाहिए मगर लोगों की कुछ बातें दिल को गहरा दर्द दे गयीं तो आप सब से बाँट रहा हूँ। और यह समस्या सिर्फ आज के कार्यर्क्रम की नही कई जगह की है

एक सामान्य श्रोता को नही पता कि भैरवी और खमाज में क्या फर्क है अगर आप एक ही ताल में एक ही जैसी चीज़ सुनाये जा रहे हैं तो सामान्य आदमी के लिए वह एक बोरिंग रिपीटेशन से ज्यादा कुछ नही है।क्या सूफी, ग़ज़ल, कुछ अच्छे भजनों के साथ मिलाकर यदि कुछ विशुद्ध शास्त्रीय कार्यक्रम भी पेश किये जाएँ तो मेरा ख्याल है एक सामान्य व्यक्ति अपने आप को वहां फंसा हुआ नही पायेगा।

दूसरी समस्या मुझे शुद्धतावाद के नाम से होती है, क्या करेंगे हम शुद्धता का जब विधा ही लुप्त हो जाएगी।कभी पंडित रविशंकर को किसी विदेशी कार्यक्रम में बजाते सुनिए, वो इतनी तेज़ी से और आकर्षक ढंग से शुरू करते थे कि सुनने वाला एक पल के लिए चौंकजाता और फिर बिना सुने नही रह पाता था। ऐसा ही कुछ उस्ताद राशिद खान, अमज़द अली खान और शुभा मुद्गल की प्रस्तुति में भी होता है।

शुद्धता की इसी बीमारी ने हिंदी को हास्यास्पद बना डाला है। और सही भी है जब ट्रेन के स्थान पर लौहपथ गामिनी अग्नि रथ शब्द की बात करी जाये तो ना हंसने वाले के साथ निश्चित ही समस्या होगी। ठीक वैसे ही हनी सिंह के गाने सुनने के आदी लोगों को एकदम से 3 घंटे बैठाकर के ख्याल सुनाकर उनकी संगीत में रूचि पैदा करने की कोशिश भी कितनी कारगर है हमें सोचना चाहिए।

आज के तथाकथित बड़े बड़े लेखक साहित्यकार ऎसी हिंदी की कहानियाँ, कविता लिखते हैं जिन्हें समझने के लिए साहित्यिक अल्फा-बीटा, थीटा आदि की ज़रुरत पढ़ती है और अगर किसी का लिखा ज्यादा लोगों को समझ आजाये तो उसका साहित्य की बिरादरी से हुक्का पानी बंद हो जाता है और अंत में रोना पीटना होता है,
"साब आजकल हिंदी को कोई पूछता नही, क्लासिकल को तो कोई सुनना नही चाहता"।

सच बात तो यह है कि लोग सुनाना नही चाहते।
मैंने लगभग हर कवि सम्मलेन में देखा है और आज यहाँ भी देखा कि परफॉरमेंस से पहले कई बड़े कलाकार अपनी फोटो खिंचवाने में लगे रहते हैं और अपना काम निपटते ही उन्हें कोई अर्जेंट काम याद आ जाता है। जब आप खुद ही अपने साथी को सुनना नही चाहते हो हमें काहे सुनने को बोल रहे हो भाई। हमारा सन्डे क्या सन्डे नही है क्या?

बड़ा बुरा लगता है जब कई निस्वार्थ रूप से समर्पित लोगों के कई प्रयासों पर कुछ गलत परम्पराएँ हावी हो जाती हैं।
इन सारी चीज़ों ने इस देश को और इसकी बौद्धिक विरासत को काफी नुक्सान पहुँचाया है। बड़ी ग्लानी होती है जब यह कहना पड़ता है कि फर्रुखाबाद घराने का अब कोई भी फर्रुखाबाद में नही है। मुझे अन्दर से लगता भी है ये सूरत बदलनी भी चाहिए किन्तु इस तरह की हरकतों से(जो आज के कार्यक्रम में देखीं) तो हम अपनी आने वाली पीढ़ी के मन में अपने साहित्य और शास्त्रीय संगीत के प्रति एक खौफ पैदा कर रहें हैं।

अगर आप इस पोस्ट को पढ़ रहे हैं और आप साहित्य या संगीत से जुड़े हैं तो कोशिश करिए की उसे सभी के समझने लायक बनायें और यकीन मानियें ऐसा आप उसकी क्वालिटी को गिराए बिना भी कर सकते हैं।

मंगलवार, 23 सितंबर 2014

दीपिका पादुकोण और टाइम्स ऑफ़ इंडिया, कपड़ों और भाषा से परे यहाँ सब गुंडे हैं

एक सज्जन ट्रेन में जा रहे थे और सो गए किसी ज़रूरतमंद आदमी ने उनकी जेब से उनका मोबाइल निकाल लिया। जब वह उठे तो बड़ा दुखी हुए मुझसे मांगकर फोन बीवी को लगाया था और फोन उठाते ही उससे बोले

"तुम्हारी गलती से आज मोबाईल चोरी हो गया।
घर आकर बताता हूँ तुझे!"

मेरे कुछ पूछने से पहले खुद ही बताया कि , साहब बीवी ने सुबह पेट भर कर आलू के पराठे खिला दिए तो नीद आगई, न वो पेट भर कर खिलाती न ये नुक्सान होता।

हिन्दुस्तान में हर गलत बात औरतों से शुरू और ख़त्म होती है।लव जिहाद के कारण धर्म के खतरे में आने से लेकर विराट कोहली के रन ना बनाने तक की ज़िम्मेदार सिर्फ महिलाएं ही होती हैं। एक सुन्दर सी पुलिस अफसर को उसका बॉस छेड़ता है तो गलती उस महिला की(अरुणा राय), एक नेशनल शूटर किसी उच्चवर्ग के पुरुष के प्रेम में पड़ कर उससे शादी करती है और वह व्यक्ति धोख़ेबाज निकलता है तो लड़की की (तारा शाहदेव) गलती ऐसे बताई जाती है कि जैसे अरेंज मैरिज में तो कोई झूठ बोलता नही।

पिछले दिनों टाइम्स ऑफ़ इंडिया के और दीपिका पादुकोण के बीच चल रहे विवाद ने हम सबके दिमागों में पल रही उस मानसिकता को उजागर किया जिसमें वह सिर्फ एक वस्तु है। टाइम्स सहित कई अखबार तथा चैनल अपने ऑनलाइन माध्यमों में हीरोइनों के फोटो को सनसनीखेज शीर्षकों के साथ प्रस्तुत कर के ही अपनी दुकान चलाते हैं और जो लोग कल तक बस स्टाल पर कोई राजनितिक पत्रिका उठाने के बहाने से मनोहर कलियाँ या मैक्सिम को कनखियों से देखा करते थे, आज अपने फ़ोन की स्क्रीन पर उसे जी भर कर देख कर खुश होतें हैं।
इस पूरे व्यापर के डिमांड और सप्लाई वाले तर्क के कारण इस पर आपत्ति करने का कोई औचित्य नही है मगर मुझे सबसे ज्यादा हैरानी हुई टाइम्स ऑफ़ इंडिया के एडिटोरियल को पढ़ कर।

एक अभिनेत्री के किसी पुराने विडियो को जिसमे उसके अन्तःवस्त्र गलती से दिख रहे हैं या साडी का आँचल अपनी जगह से हट गया है को आपने ज़ूम कर उसपर लाल घेरा बनाकर आपने उसे खबर बनाकर पेश किया। इस पर जब आपत्ति की हुई तो आपने लिखा की यह तो सुन्दरता का कॉम्पलिमेंट है।
क्या यही कॉम्पलिमेंट आपकी माँ, पत्नी या बहन को दिया जाये तो चलेगा?
इस पर जब फिर से दीपिका ने आपत्ति की और अपने फ़िल्मी किरदारों से अपने निजी जीवन को  अलग जाताया तो टाइम्स की प्रतिक्रिया ऎसी ही थी जैसे कि गली का कोई गुंडा किसी लड़की को छेड़ता है उसे प्रोपोज करता है और लड़की के ना कहने पर उसपर तेजाब फेंकता है या उसके चरित्र को लेकर ऊँगली उठाता है। जो चित्र साथ में टाइम्स ने छापे और जिन शब्दों के साथ कहा कि "हमने आप के *और * की बात तो नही की थी", उन्हें हिंदी में लिखने पर यह ब्लॉग 18+ की श्रेणी में चला जायेगा।

इस देश में एक विडम्बना है कि आप अगर अंग्रेजी बोलना सीख लें फिर बोआ की किताब 'the second sex' और जेन ऑस्टिन की pride and prejudice  पढ़ लें तो आप प्रगतिशील हो गए और इन सबके बीच यदि आपने इंडिया गेट पर ओरी चिरय्या जैसे गाने गा लिए तो फिर आपको एक्टिविस्ट का तमगा मिलना तय है। पिछले साल सोमा जी को याद करिए, कैसे तरुण तेजपाल जी के महिला अधिकारों को एडजस्ट किया था। यही मोहतरमा आसाराम के खिलाफ बगावत का झंडा बुलन्द करे थीं।


किसी का भी पेशा ऐसी चीज़ों की डिमांड करता है जो शायद उसे व्यक्तिगत जीवन में पसंद ना हों। और हर व्यक्ति अपने जीवन में अलग अलग घेरे बना कर रखता है। ऑफिस में बहुत सख्त बॉस प्रेमिका के सामने दयनीय हो सकता है तो सास ससुर के सामने साडी में रहने वाली महिला पति के साथ किसी बीच पर शॉर्ट्स में आराम से घूम सकती है।यह हिप्पोक्रेसी नही अपने अपने कम्फर्ट जोन का मामला है।

कोई भी कोई काम क्यों चुनता है और कैसे करता है इस बात से किसी को कोई समस्या नही होनी चाहिए और किसी के दैनिक जीवन से (विशेष रूप से लड़की के) उसे शर्मिंदा करने वाली बातें ढूंढ कर उसपर झगडा करना कहीं से भी पत्रकारिता नही है। पश्चिम के पपराजी जो घिनौनी चीज़े पत्रकारिता के नाम पर करते हैं उन्ही को हिन्दुस्तान में लागू करने की यह घटिया कोशिश है।(अगर आप को याद हो पिछले साल केट मिडल्टन की छुप कर ली गयी तस्वीरों से उन्हें कैसे शर्मिंदा करा गया था)

टाइम्स ऑफ़ इंडिया का यह आर्टिकल बताता है कि भाषा, बोलचाल, कपड़ों आदि के अंतर के बाद भी लोग अन्दर से एक जैसे ही हैं, घटिया और जंगली।
अपनी ही लिखी कुछ पंक्तियाँ याद आती हैं

"तुम्हारे लिबास
कम ज्यादा
आधे पूरे
चमकते सादा
चाहे जो हों
फर्क नही!
इस शहर की
तहजीब है
तमाशा देखना" -©अनिमेष

मंगलवार, 2 सितंबर 2014

लव और जिहाद दोनों को अलग अलग ही रखो भाई

जैसे गुलाब और जामुन दोनों मिलकर जब गुलाब जामुन बन जाते हैं तो उसका अर्थ कुछ और ही होजाता है। ऐसा ही आज कल चर्चा में आये दो शब्दों के साथ है।
लव अर्थात प्रेम और जिहाद अर्थात अपने आप के साथ किया गया संघर्ष, किन्तु जब दोनों मिलकर साथ आते हैं तो यह लव जिहाद एक दुसरे ही अर्थ में सुनाई देता है।


ये लव जिहाद वास्तविक है या राजनितिक कल्पना इसका उत्तर मेरे पास न है न मुझे चाहिए मगर कुछ बातें मै दोनों पक्षों (सेक्युलर vs हिंदुत्व) से पूछना चाहता हूँ।

तारा सहदेव के साथ जो कुछ भी हुआ क्या वैसी हिंसा किसी और लड़की, चाहे उसकी शादी कैसे भी हुई हो, के साथ नही होती।

अगर आपकी बहन, बेटी इतनी बेवकूफ है कि किसी भी लड़के के पास में एंड्राइड फ़ोन या पल्सर मोटरसायकिल देख कर उसके साथ चल दे तो उसको पढ़ाइये लिखाइये ना कि लड़कों के पीछे पड़ जाइये।

जब हिंदुत्व को बचाने के नाम पर 5-10 बच्चे पैदा करने की बात करी जाती है तो क्या यह समाज और राष्ट्रद्रोह नही है।(संसाधनों और जनसँख्या के कारण)

आपने कितने मुस्लिमों को देखा है जो एक से ज्यादा बीवियाँ रखते हैं।मेरी जानकारी में ऐसा कोई नही है।

और फेसबुक और whatsapp पर आने वाले sms कि फलानी जगह मंदिर गिराया जा रहा है उस जगह मस्जिद को नुक्सान पहुँचाया गया, क्या ये इतने छोटे मामले हैं कि सिर्फ sms में सिमट जाएँ।याद रखिये कि एक मस्जिद गिरी थी तो देश आजतक भुगत रहा है।


मोरल ऑफ़ स्टोरी ये है कि लव भी करिए और अपने आप के साथ जिहाद भी करिये (कृष्ण ने भी कहा है युद्ध करो पार्थ!) मगर दोनों को अलग अलग अलग रखिए।

नोट- यह पोस्ट रोज रोज आने वाले स्पैम sms के लिए लिखी है जो धीरे धीरे कैंडी क्रश की जगह ले रहें हैं।