कैसे शुरू में सीक्रेट बता कर बाद में 'कहना मत' का भरोसा लेने वाली दोस्ती 7 बजते ही अपने आप 2 कप चाय मंगवाने वाली रोज़ की मुलाकात में बदलती है और फिर फेसबुक के पन्नों से लटकती तस्वीर में बदल जाती है।
गौर फरमाइए

ये बात
परसों से दो दिन पहले की ही तो है
जब,
रोज़ के सुनसान चेहरे से हट कर
एक रोज़
डरी डरी सी मुस्कान दी थी तुमने,
और फिर बातों बातों में
पता चला कि,
'कागज़ के फूल' तुम्हे भी पसंद हैं
और अमृता से 'रसीदी टिकट'
तुमने भी ले रखा था
हर इतवार,
नुक्कड़ की जलेबी के साथ छनकर
कई किस्से मीठे हुए
मगर पिछले मोड़ पर जब
रास्ते घूमे
तो,
घर तक का सफ़र
कुछ तनहा सा हो गया था,
अब जब कभी खिड़की से
बाहर झांक लेता हूँ
तो,
उन गलियों में कतरा कतरा,
हम दोनों को छूटा सा पता हूँ
1- कागज़ के फूल -> गुरुदत्त वाली
2-अमृता प्रीतम की किताब रसीदी टिकट
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें