इसलिए भी कि उनका जन्मदिन आ रहा है,
इसलिए भी कि "oh hindi!" जैसे जुमलों के बीच वो चुपके से ज़री वाले आसमान से हो कर हिंदी गीत के लिए ऑस्कर ले आते हैं,
इसलिए भी कि 'पिछले पन्ने' में लिखे गए उनके संस्मरण साहिर, जादू और गोरख पाण्डेय को जिंदगी का हिस्सा सा बना देते हैं, और इसलिए भी कि दिमाग घर पर रखकर देखी गयी साज़िद खान की हमशक्ल के टॉर्चर के बीच उनकी अंगूर की errorless comedy याद आती है,
इसलिए भी बड़ी गंभीर सी कोई नज़्म समझाते समझाते अचानक वो रटवा देते हैं कि "चड्डी पहन के फूल खिला है", और इसलिए की चार बोतल वोडका के बाद एक ही चीज़ नाचने को मजबूर करती है "सपने में मिलती है कुड़ी मेरी।"
कभी जिगर से जलती बीड़ी, कभी नमक इश्क़ का तो, कभी "लटों से उलझी-लिपटी रात हुआ करती थी" या फिर कभी "बैठें हैं तस्सुवरे जाना किये हुए" जैसे गीतों से हर बार प्रेम को एक नया रूपक देने के बाद भी शायद साहित्य के महाग्रंथों में भले ही इन गीतों को जगह ना मिले मगर आने वाले कई गीतकार, शायर, लेखक जिनमें चाहे आलोक श्रीवास्तव जैसे बड़े उम्दा नाम हों या मेरे जैसे बेहद मामूली और गुमनाम छात्र इनसे ही द्रोणाचार्य और एकलव्य की तरह तालीम लेते रहेंगे।
गुलज़ार साहब से दो चीजें मैंने भी सीखी है।
(ये नही पता अमल में कितनी आई)
घटनाओं के बीच में एक पल को जब दुनिया ठहर जाती है उस लम्हे को शब्दों में कैद करना, जैसे वो
कहते हैं
"फितूर है मेरा मगर फिर भी
मोहल्ले वालों की नज़र बचाकर
उस खम्बे से पूछा करता हूँ,
मेरे जाने के बाद वो आई थी क्या"?
या घर के किसी भी कोने से कोई शब्द उठा कर उसे एक ताज़ा नज़्म बना देना, वरना रिक्शा, सीली सीली रात, बीड़ी और चिमटा को शायद ही कभी कविता में कोई और गीतकार जगह देता।

खैर जब किसी ने मेरी कविता
"वक्त तुम्हारे संग
मखमल सा गुज़रता है,
कुछ पुराना सामान है घर में
हटा लूं, तो यही बसा लूं तुम्हे"
या
"बाढ़ पैरों से बहाकर लगई
तान के छतरी खड़े से रह गये"
पढ़ कर पूछा कि, गुलज़ार को पढ़ कर लिखा है?
तो जो अहसास हुआ उसे बयाँ नही कर सकता।
शुक्रिया गुलज़ार साहब हम सबको गुलज़ार करने के लिए।
behatarin bahut umda
जवाब देंहटाएंBahut sundar Animesh...
जवाब देंहटाएंबेहद सुन्दर.......देखा..किस कदर आसान है उन्हें चाहना....
जवाब देंहटाएंज़िन्दगी मुबारक गुलज़ार साहब...
अनु
शुक्रिया
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