रविवार, 27 जुलाई 2014

आज की मसाला चाय

हिन्दुस्तान कैसे चीज़ों को अपनाता है,
कैसे वो चीज़ों का भारतीयकरण करता है
इसे आप चाय से समझ सकते हैं।

100 -125 साल पहले जिस बला का नाम नही सूना होगा वो आज इंडियन होने की पहचान है।
चाय की खासियत उसका आम होना है
चाय और चायवालों के इस दौर में 'मसाला चाय'
भी हाथ आई।
दिव्य प्रकाश दुबे जी की मसाला चाय ।

मै और मेरा दोस्त अक्सर आपस में बातें करते थे
कि हिंदी में कोई ऐसी कहानी की किताब नही मिलती
जिसे याद रखा जाये, जो अपनी सी लगे बनावटी नही।

हम अक्सर हिन्दुस्तान को भारत और india में बाँट देते हैं मगर एक हिस्सा ऐसा भी है जो इन दोनों के बीच झूलता है और मसाला चाय इस तबके की कहानियाँ कहती है।

घर से सुबह पूजा का प्रसाद लेकर निकलने वाला लड़का शाम को दारू पार्टी करता है।
सावन के सोमवार का व्रत करने वाली कोई Ms xyz
Weekends पर किसी को फील करती है।
दिव्य ने बिना judgement दिए इन सारी बातों को कहानियों में पिरोया है।

अगर साहित्य समाज का दर्पण होता है तो ये कहानियाँ आप को आज की पीढ़ी की सीधी इमेज दिखा रहा है।

Love you forever की गरिमा, fill in the blank की कावेरी या ऐसा कोई और किरदार मैंने अक्सर अपने पास से गुज़रते देखा है।

up बोर्ड से पढ़कर आने वाले बच्चों के साथ english improvement के नाम पर जो शोषण और मजाक होता हैं उसे भी झेला है।

और दिव्य की मिस बजाज की बात से पूरी तरह सहमत हूँ की इंग्लिश सिर्फ पर्सनालिटी का एक पार्ट है मगर लोग शायद ही समझते हों।

इंग्लिश से एक और बात भी आई दिमाग में इस किताब में इंग्लिश का इस्तेमाल, तो भाई खाने के साथ अचार के हद तक ये सही है बस ये ध्यान रहे की आगे जाके हिंगलिश ना हो जाये।

और ज्यादा लिखने का कोई तुक नही किताब पढ़िए फिर सोचिये, मै चला मेरी चाय ठंडी हो रही है
बाय

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